23.4.09

न जाने क्या-क्या होगा इस चुनाव में?

सपनों की उड़ान इतनी तेज भी नहीं थी किउसे पूरा भी न कर सकती थी पर लगा कि अब हारना ही है। ऐसा ही कुछ आया था दिमाग में जब कि मैं चली जा रही थी उस पार। सब कुछ ठीक वैसा ही पाया जैसा कि छोड़ गई थी। वही दीवार, वही दरवाजे, वही खिड़कियाँ.......लोग भी वही पर कुछ ऐसा भी लग रहा था कि जैसे कुछ बदल भी गया है।

हाँ जी बदला था तो अब लोगों का नजरिया। इधर अपनी शौकिया पत्रकारिता के कारण फील्ड में थी। घूमते-घामते अपने गाँव की तरफ़ मुड़ गई। वहां लोगों को देख कर लगा कि अब वो बात नहीं रह गई है। आदमी की शक्ल में अब दरिन्दे घूमते दिख रहे थे। नजरों में वहशीपन, हर कोई उनको अपना दुश्मन दिख रहा था। कारण था चुनाव.....

इस चुनाव में न जाने और क्या-क्या होगा?

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