23.4.09

न जाने क्या-क्या होगा इस चुनाव में?

सपनों की उड़ान इतनी तेज भी नहीं थी किउसे पूरा भी न कर सकती थी पर लगा कि अब हारना ही है। ऐसा ही कुछ आया था दिमाग में जब कि मैं चली जा रही थी उस पार। सब कुछ ठीक वैसा ही पाया जैसा कि छोड़ गई थी। वही दीवार, वही दरवाजे, वही खिड़कियाँ.......लोग भी वही पर कुछ ऐसा भी लग रहा था कि जैसे कुछ बदल भी गया है।

हाँ जी बदला था तो अब लोगों का नजरिया। इधर अपनी शौकिया पत्रकारिता के कारण फील्ड में थी। घूमते-घामते अपने गाँव की तरफ़ मुड़ गई। वहां लोगों को देख कर लगा कि अब वो बात नहीं रह गई है। आदमी की शक्ल में अब दरिन्दे घूमते दिख रहे थे। नजरों में वहशीपन, हर कोई उनको अपना दुश्मन दिख रहा था। कारण था चुनाव.....

इस चुनाव में न जाने और क्या-क्या होगा?

1 comment:

  1. नमस्कार,
    इसे आप हमारी टिप्पणी समझें या फिर स्वार्थ। यह एक रचनात्मक ब्लाग शब्दकार के लिए किया जा रहा प्रचार है। इस बहाने आपकी लेखन क्षमता से भी परिचित हो सके। हम आपसे आशा करते हैं कि आप इस बात को अन्यथा नहीं लेंगे कि हमने आपकी पोस्ट पर किसी तरह की टिप्पणी नहीं की।
    आपसे अनुरोध है कि आप एक बार रचनात्मक ब्लाग शब्दकार को देखे। यदि आपको ऐसा लगे कि इस ब्लाग में अपनी रचनायें प्रकाशित कर सहयोग प्रदान करना चाहिए तो आप अवश्य ही रचनायें प्रेषित करें। आपके ऐसा करने से हमें असीम प्रसन्नता होगी तथा जो कदम अकेले उठाया है उसे आप सब लोगों का सहयोग मिलने से बल मिलेगा साथ ही हमें भी प्रोत्साहन प्राप्त होगा। रचनायें आप shabdkar@gmail.com पर भेजिएगा।
    सहयोग करने के लिए अग्रिम आभार।
    कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
    शब्दकार
    रायटोक्रेट कुमारेन्द्र

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