Showing posts with label संवेदना. Show all posts
Showing posts with label संवेदना. Show all posts

20.3.09

......और मर गई वो बच्ची

अपनी पिछली पोस्ट में हुल्लड़ के दौरान जिस लड़की (बच्ची) की चर्चा की थी वह अब इस दुनिया में नहीं रही। अपने ऊपर हुए पौरिशिक लैंगिक जुल्म का इलाज कराते-कराते सभी तरह के कष्टों से मुक्त हो गई।

जीत हुई उन नर पिशाचों की जो खुलेआम तो खून नहीं पीते पर अपने अंगों (गुप्त) के द्वारा बच्चियों का खून पीते हैं। कोई पूछेगा उनसे की होली में की गई इस शारीरिक क्रिया से उन्हें क्या सुख मिला?


कोई नहीं पूछेगा.......लड़की को ही छिनाल, बेहया, बेशर्म कहा जायेगा।


फूलों का एक गुच्छा उस बच्ची के नाम


(गूगल से साभार लिया है)

18.2.09

संवेदना की चाह


हर सांस संवेदना की चाह रखती है,
हर धड़कन दिल में आसमान रखती है।
कौन जाने कहाँ रुके उड़ान?
कौन जाने कहाँ शाम हो?
है मकसद बिना रुके आगे बढ़ने का,
अपने आप को कुछ साबित करने का,
क्या मिला है मौका या
क्या मिलेगा मौका?
कौन बतायेगा मुझे?
कौन समझायेगा मुझे?
क्यों समझते हो मुझे कि
बनूँगी बोझ,
समझो कि मैं भी हूँ
एक अस्तित्वधारी,
एक जीवधारी।
नहीं देख पाते हो तुम मुझे अभी,
क्योंकि नहीं है चाहत तुम्हें
मुझे देखने की,
देखा है तुमने मुझे यंत्र के सहारे,
रुको, देखो मुझे अपनी आंखों के सहारे,
तब बताना कि क्या मैं बोझ हूँ?
तब बताना कि क्या मैं तुम्हारी नहीं?
तब बताना.............
आह! क्या और एक मौका नहीं है?
आह! क्या बस एक आह ही है....
क्या बस एक आह ही है?????