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20.3.09

......और मर गई वो बच्ची

अपनी पिछली पोस्ट में हुल्लड़ के दौरान जिस लड़की (बच्ची) की चर्चा की थी वह अब इस दुनिया में नहीं रही। अपने ऊपर हुए पौरिशिक लैंगिक जुल्म का इलाज कराते-कराते सभी तरह के कष्टों से मुक्त हो गई।

जीत हुई उन नर पिशाचों की जो खुलेआम तो खून नहीं पीते पर अपने अंगों (गुप्त) के द्वारा बच्चियों का खून पीते हैं। कोई पूछेगा उनसे की होली में की गई इस शारीरिक क्रिया से उन्हें क्या सुख मिला?


कोई नहीं पूछेगा.......लड़की को ही छिनाल, बेहया, बेशर्म कहा जायेगा।


फूलों का एक गुच्छा उस बच्ची के नाम


(गूगल से साभार लिया है)

15.2.09

चरम सुख की चाह, शरीर की मांग

सुख के चरम खोजने में कल बहुत से नवयुवक-युवतियों को बेइज्जती का सामना भी करना पड़ा। चरम सुख क्या है और कैसा है यह वही जानता है जो इस सुख को प्राप्त करचुका हो। विचार ये करना चाहिए कि क्या शारीरिक सुख ही चरम सुख है। कहा जाता है कि प्यार की शुरुआत चेहरे से शुरू होकर क्रमशः नीचे की ओर होती है। जितनी देर प्यार का आरम्भ चेहरे में लगाता है उससे कहीं ज्यादा समय वह देह की मांसलता को जांचने में लगा देता है।
शरीर के उभार, शरीर का कटान, देह की माप आदि-आदि क्या कुछ नहीं है जो किसी भी अच्छी भली स्त्री को उत्पाद बना देती है। कुछ स्त्रियां अपने स्वरूप से खुद को उत्पाद बनातीं हैं किन्तु अधिकतर स्त्रियों को पुरुषों की निगाहें ही उत्पाद बनातीं हैं। कपड़ों के ऊपर से भी नंगा कर देने की ताकत रखने वाली कामुक निगाहों का परिणाम होता है कि स्त्री को कुलटा तक कह दिया जाता है।
बहरहाल सुख की चाह हो या फिर तृप्ति के लिए किसी शरीर की मांग, सब में शरीर ही सर्वोपरि हो जाता है। क्या कभी कोई ऐसा दिन आयेगा जबकि प्यार की पहचान शरीर की माप से ऊपर, शरीर की गोलइयों से इतर नारी के व्यक्तित्व के रूप में पुरुष करेगा? अपने आसपास समान कार्य करने की स्थिति में भी नारी उसकी निगाहों से स्वयं का बलात्कार होते महसूस नहीं करेगी?