आओ मैं तुम्हें
अपने प्यार से सराबोर कर दूँ,
आओ मैं तुम्हारे
व्यथित मन को शांत कर दूँ,
आओ मैं तुम्हारी
धड़कनों को धड़कने का बहाना दूँ,
आओ मैं तुम्हें
जिन्दगी जीने का ठिकाना दूँ,
आओ मैं तुम्हें
अपने तन की तपिश दूँ,
मैं तुम्हें दे सकती हूँ
वह सब जो तुम चाहो,
मैं दे सकती हूँ वह सुख
जो तुम तलाशो,
आओ मेरी बाँहों में
और खो जाओ मेरी दुनिया में,
न शरमाओ,
पास आओ,
तुमने तो खोजा है हमेशा
नारी में उसका तन,
नहीं खोजा उसका मन,
तुम्हारी तलाश के लिए नहीं,
तुम्हारी प्यास के लिए नहीं,
मैं सब कुछ दे सकती हूँ,
क्योंकि
मैं नारी हूँ,
मैं माँ हूँ,
मैं दात्री हूँ,
पर एक पल को रुको
और सोचो,
तुम क्या हो?
5.4.09
मैं दे सकती हूँ सब कुछ
18.2.09
संवेदना की चाह
हर सांस संवेदना की चाह रखती है,
हर धड़कन दिल में आसमान रखती है।
कौन जाने कहाँ रुके उड़ान?
कौन जाने कहाँ शाम हो?
है मकसद बिना रुके आगे बढ़ने का,
अपने आप को कुछ साबित करने का,
क्या मिला है मौका या
क्या मिलेगा मौका?
कौन बतायेगा मुझे?
कौन समझायेगा मुझे?
क्यों समझते हो मुझे कि
बनूँगी बोझ,
समझो कि मैं भी हूँ
एक अस्तित्वधारी,
एक जीवधारी।
नहीं देख पाते हो तुम मुझे अभी,
क्योंकि नहीं है चाहत तुम्हें
मुझे देखने की,
देखा है तुमने मुझे यंत्र के सहारे,
रुको, देखो मुझे अपनी आंखों के सहारे,
तब बताना कि क्या मैं बोझ हूँ?
तब बताना कि क्या मैं तुम्हारी नहीं?
तब बताना.............
आह! क्या और एक मौका नहीं है?
आह! क्या बस एक आह ही है....
क्या बस एक आह ही है?????
14.2.09
नहीं फर्क
आज पहली ही पोस्ट पर चार टिप्पणी देखकर लगा कि शायद कुछ सार्थक लिख सकूँ। हालांकि लेखन से पुराना नाता रहा है पर कहा जाये तो स्वान्तः सुखाय वाली स्थिति ही अधिक रही है। इंटरनेट पर तो पहली ही बार लिखा गया और उस पर एक समर्थक का मिलना भी उत्साहवर्द्धक रहा। यद्यपि पहली पोस्ट पर मिली पहली टिप्पणी से लगा कि अभी भी महिलाओं को लेकर एक तरफा उत्पाद वाली सोच है पर बाद में मिली टिप्पणियों ने सहारा सा दिया। इसी उत्साह में एक और पोस्ट - आज की दूसरी पोस्ट- आपके समक्ष है।
कौन किस नजर से देखता है
क्या सोचता है
नहीं फर्क,
कौन किस तरह सराहता है
कौन क्या कह गुजरता है
नहीं फर्क,
बदलते वक्त के साथ
बदलती है नजर,
कौन वक्त के साथ बदलता है
नहीं फर्क,
है याद आज भी दिल में उसकी
कहीं गहरे तक,
कौन अपने दिल को बदलता है
नहीं फर्क,
दरिया भी बुझा सकता है
एक प्यासे की प्यास,
कौन ओस की बूँद से बुझाता है
नहीं फर्क।